प्रवासी पुत्र

 प्रवासी पुत्र के पास 
आया माँ का एक सन्देश 
बेटे भरनी है फ्लैट की किस्त 
भेज देना अपनी प्यार भरी जिस्त
माँ का जब जब सन्देश आता है 
बेटे का मन मचल मचल जाता है
बचपन की कई खट्टी-मीठी यादें 
याद दिला जाती है बहुत सारी बातें 
क्षण में माँ के पास पहुँच जाता है मन 
मचल उठता है तन 
मन में जब जब चलता है कई विमर्श 
तब तब मिलता है पत्नी का स्नेह भरा स्पर्श 
पत्नी माँ बहन बन मन को सहला जाती है
माँ के आंचल की जगह 
अपने रुमाल से मुंह पोंछ जाती है
मजबूरी है उसकी जींस में आँचल नहीं पाती है
माँ का आंचल तो मिलता है भारत में
जो बच्चे के सारे दर्द को
अपने में समेट लेता है
बिन माँ के बच्चे अपना दर्द स्वयं ढो़ते हैं
माँ के दुलार भरे स्पर्श की जगह 
कहीं प्लेंटे धोते हैं
मन में आ जाए कहीं ख़रास 
तो मिलता है कभी क्रेश तो कभी दूरदर्शन की मिठास 
जीवन की थपेड़े खाता
माँ-पिता की कमाई में
रह जाता है वह अधुरा 
पिता के मन में रह जाती है टीस
उन्मुक्त गगन में विचरने वाला बचपन 
खट्टी-मीठी अमियों को तोड़ने का सुख 
गलतियों पर पिता की डांट से बचाता 
माँ का आँचल 
सब कुछ खो जाता है 
चंद डाँलर की खनक में
झोपड़ी वन से महल तक घुमने वाला बचपन 
जब बित्ते भर ज़मीन में
एक अदद लाडले को पालता 
तब दादी का कलेजा है सालता 
काश मेरी गोद में वह खेलता 
ले जाता मेरा प्यार दुलार 
उसी आँचल में समा जाने को
जब आ जाता है प्रवासी लाडला 
वर्षों के वंचित प्यार से
मरुभूमि बने हृदय को
है वह भिंगोता 
पोता खड़ा दूर से
यह सब है देखता 
भारत के इस प्यार में हो जाता है गुम
बच्चा तब चकरा है जाता 
जब भारत की भूमि पर पैर रखते ही
वही माँ , बच्चे को समेट लेती है
अपने आंचल में
बच्चा सिमट सिमट जाता है
प्यार समेट नहीं पाता है
पूछता है प्यार का यह तरीका 
क्यों नहीं तुम विदेश में अपना पाती हो
दफ्तर में मरती हो, खपती हो
शाम को चेहरे को रगड़ रगड़ के धोती हो
कैसी कैसी निगाहें 
चेहरे पर अटकी अटकी महसूस करती हो
संतान के प्यार से रह जाती हो वंचित 
क्यों नहीं कर पाती 
अपनी ममता में मुझ में संचित 
डाँलर जीवन का प्रवाह भर है
हम सबों को दौड़ाता है
इधर से उधर तक
हमें अपने ज़मीन से
काट देने की
है यह सोची समझी साजिश 
क्यों नहीं समझ पाती 
जीवन हो रही डालर से पालिश 
इसी में आ जाता है बड़ा भाई 
लिये मन में एक ख्वाइश 
सुना जाता है भाभी की फरमाइश 
माँ जब लुटाने लगती है स्नेह धारा
बेटा बहु जब डुबने लगते हैं 
ममतामयी धारा में
तभी मज़धार में
जेठानी पकड़ लेती है बाह 
सुनाने लगती है अपनी आह 
तुम जिस ममतामयी धारा में बह रही हो
उसमें है आधा मेरा हिस्सा 
यदि नहीं गई तू यहाँ से 
तो ये हो जाएगा यह पूरा किस्सा 
इतने में आ जाता है देवर 
सुनता है भाभी की बात 
टूट जाती है उसकी आस 
कहता है, भाभी तुम जिस ममता को किस्सा बना रही हो
वर्षों से माँ तो तुम पर ही लुटा रही हैं
मैंने क्या कभी की है कोई शिकायत 
भाभी तुम माँ-पिता का ध्यान रखती हो
इसीलिए सारा प्यार भी तुम ही पाती हो
मुझे तो चाहिए तुम्हारा भी सारा प्यार 
माँ बीच में ही बोल पड़ती है
क्या कोई सुनेगा मेरी भी
माँ के लिए है सभी संतान बराबर 
जिस बेटे ने वर्षों से न हो माँ छुआ 
क्या वह माँ का आलिंगन नहीं करेगा 
इससे क्या आसमान टूट पड़ेगा ?
जिस लाल को देखने को ,
वर्षों तरसी हैं आँखें 
उसे तृप्त कर लेने दो 
लगाओ लांछन अधिक प्यार लुटाने का
पर हिसाब करना बराबर 
जो मेरे पास है रहा 
क्षण-क्षण , पल-पल, स्नेह में है पला 
इस दूध मुहें लाल को
छोटे उम्र से ही
मैंने अपने से है अलग किया
मेरे ऊपर क़र्ज़ है उसकी ममता का
मुझे इस क़र्ज़ को उतारने दो
भरपूर ममता लुटाने दो
इस नई नवेली बहु ने
कहाँ है मुझे जाना 
पोते ने तो पहली बार है देखा 
ईर्ष्या को वाशिंग मशीन में धुल जाने दो
भारत की परम्परा को तन जाने दो
एक माँ को बेटे से मिल जाने दो 
एक माँ को बेटे से मिल जाने दो  |
                                                    प्रतिभा प्रसाद |







No comments:

Post a Comment