Kavitayen from My book "JHANKAR (Kavya Sangrah)" (Hindi Poems)
aakhir ek din in pdf format
Books are available on amazon
http://astore.amazon.com/aakhieekdin-20?_encoding=UTF8&node=1
My Aakhir ek din hindi short story collection is on amazon around the world
for india amazon.co.in
http://www.amazon.in/gp/product/B016GESE7E…
झुठ
झुठ के खिडकी दरवाजे
छल का घर मे रहना
क्या रखा है ऐसे घर में
जहां सच हो सपना
रिश्ता हो जब छल से सींचा
रिश्तों मे खिचातानी
छल के कुनवे भर जायेगें
नही कहीं सच का पानी
झुठ के खिडकी दरवाजे
सच को ढक नही पाते
छल के कनवे लड लड कर
आपस में मर जाते
अन्तिम विजय सच की होती
होता मन अभिमानी
आओ चल कर प्रण कर लेते
सच जीवन का सानी
सच में रहना
सच में जीना
तप करना है ग्यानी
सच की यही कहानी
स्व रचित. प्रतिभा
छल का घर मे रहना
क्या रखा है ऐसे घर में
जहां सच हो सपना
रिश्ता हो जब छल से सींचा
रिश्तों मे खिचातानी
छल के कुनवे भर जायेगें
नही कहीं सच का पानी
झुठ के खिडकी दरवाजे
सच को ढक नही पाते
छल के कनवे लड लड कर
आपस में मर जाते
अन्तिम विजय सच की होती
होता मन अभिमानी
आओ चल कर प्रण कर लेते
सच जीवन का सानी
सच में रहना
सच में जीना
तप करना है ग्यानी
सच की यही कहानी
स्व रचित. प्रतिभा
पुरानी यादें
पुरानी यादों से निकल कर
पुरानी बातों से निकल कर
पुरानी दोस्त मिली है आज
कुछ उपहार लिए कुछ पत्तीया
बहुत सारी बतियाँ
कुछ खट्टे मिठे व्यंजन
कुछ खट्टी मिठी यादें
और मिला एक रूमाल पुराना
याद दिला गया गुजरा जमना
सब रख छोडे कोई कैसे
जब प्यारी हो वैसे का वैसे
वक्त की विरासत में
ये अनमोल हुआ करती है
यादों में सब चीजें
सजीव हुआ करतीं हैं
मिठी यादें बासी
खट्टी हैं सब ताजी
चटखारें ले लेकर
चाहे बातें कर लो जीतनी
रहेंगीं ये उतनी ही अपनी
यादों के झरोखों से
झाकेगीं ये अक्सर
बाहें फैलाकर मिल लो
या आखें फेरो अपनी
ये रहेंगी अपनी की अपनी
पुरानी यादों से निकल कर
पुरानी बातों से निकल कर
पुरानी दोस्त मिली है आज
.........स्व रचित
खुशफहमी
खुशफहमी थी मुझे
कि साथ हो तुम मेरे
तुम्हारे छल के तीर
निशाने पर मेरा विश्वास
त्याग तपस्या निष्ठा
निशाना चूका या
साईं ने थामा
साईं ने विश्वास का
मुझे फल दिया
जो भी हुआ
खुशफहमी टुटी
लोग बेनकाब हुए
छल का जीवन है शेष
बचा न उसका कुछ लेश
मेरी खुशफहमी की
तुम साथ हो मेरे
अब नही है
क्यो की
तुम कभी
पास भी नही थे मेरे
था तो सिर्फ छल धोखा
रह गया वह अकेला
किसी और पात्र के तलाश में
ताजी स्वरचित है
कि साथ हो तुम मेरे
तुम्हारे छल के तीर
निशाने पर मेरा विश्वास
त्याग तपस्या निष्ठा
निशाना चूका या
साईं ने थामा
साईं ने विश्वास का
मुझे फल दिया
जो भी हुआ
खुशफहमी टुटी
लोग बेनकाब हुए
छल का जीवन है शेष
बचा न उसका कुछ लेश
मेरी खुशफहमी की
तुम साथ हो मेरे
अब नही है
क्यो की
तुम कभी
पास भी नही थे मेरे
था तो सिर्फ छल धोखा
रह गया वह अकेला
किसी और पात्र के तलाश में
ताजी स्वरचित है
सास संहारक मंत्र (Translated in German language)
सास बहू के व्यवहार से तंग - परेशान ,
बहू सास की हुकूमत से आतंकित- हैरान
बहू सास की हुकूमत से आतंकित- हैरान
जीवन - नैया में हाथ पाँव मारती
तलाशती रही किनारा
कैसे हो बुढ़िया से छुटकारा
अचानक मानो बिजली-सी कौंधी
बहू एक वैध के पास पहुची
याचना की एक ऐसे जहर की
जो आहिस्ता - आहिस्ता अपना काम करे
बुढ़िया का काम तमाम करे
लोगों को जरा भी उस पर शक न हो
जहर अपना काम कर जाए
बुढ़िया चुपचाप मर जाए ।
बैध जी चकराएतीस दिनों के लिए
तीस खुराक थमा कर मुस्कुराए
साथ ही यह बात भी समझाई
किसी को तुम पर ज़हर देने का शक न हो
इसलिए रोज नए - नए पकवान बनाना
और एक पुड़िया मिलाकार खिलाना
अति मधुर व्यवहार से लोगों को रिझाना
महीना पूरा होते ही तुम्हारा काम हो जाएगा
ज़हर अपना काम कर जाएगा ।
बहु ने लगन से ज़हर का जुगत लगाया
नित नए व्यंजनों से सास को रिझाया
बाकी का काम मधुर व्यवहार कर गया ।
सास रोज पड़ोसन से करने लगी बहु का गुणगान ,
बहु हैरान परेशान !
दवा खत्म होने को थी सारी
अब बुढ़िया लगाने लगी प्यारी
ज़हर का आखिरी खुराक
ज़मीर ने दिया जवाब
भागी - भागी वैधजी के पास पहुंची
पाँव पकड़ लिये
सास को बचाने की गुहार लगाई
वैधजी मुस्कुराये , कहा
दवा तो अपना काम कर गई
अब बुढ़िया को बचाना मुश्किल है
तुम्हारी सास तो मर गई
अब घर जाओ
चैन की वंशी बजाओ
साथ ही यह नसीहत की खुराक भी लेती जाओ
रोज नए व्यंजन बनाना
मधुर बोलना ,शिष्ठ्ता से पेश आना
तो सास स्वयं मर जायेगी
सास ही माँ नज़र आएगी ।
प्रतिभा प्रसाद
प्रश्नोतर (Translated in German language)
आई मैं जब काम से देर
इज्ज़त पे लगने लगा प्रश्नों का ढेर
था यह रोज़ का सिलसिला
अनाम अनजान प्रेमी
न जाने कहाँ से आ
था बीच में खड़ा
इससे निकलने की न थी कोई राह
नौकरी छोड़ भी दूँ तो
घर चलाने की थी समस्या
परिवार बड़ा था
खर्चा मुंह बाये खड़ा था
प्रश्नों की बौछार से मैं लहूलुहान थी
मरने को तैयार थी |
तभी माँ ने समझाई एक तरक़ीब
कुछ महीनों की छुट्टी ले घर बैठ गई
प्रश्नों के ढेर से निकल गई
समय से पति को दफ्तर भेज
घर में आराम से काम निपटाती
मस्ती में गुनगुनाने लगी थी
चेहरे की रौनक वापस आने लगी थी
तभी पति के साथ-साथ
सास की सांस अटकने लगी थी
ख़र्चे की तंगी खटकने लगी थी
अनाम अनजान प्रेमी की सांस टूटने लगी थी
ननद और देवर की जान सांसत में पड़ी थी
इनका बुरा हाल था
हाले बेहाल था
स्कूटर घर में पड़ा था
बस का सफ़र जारी था
इनके देर से घर आने पर
मैंने इज्ज़त पर उछाले प्रश्न
ये मौन नज़रें झुकाए खड़े थे
अपनी माँ-बहनों की नादानी पर
पश्चाताप के आंसू रोए थे
अनजान अनाम प्रेमी
कपूर बन उड़ चुका था
इज्ज़त की चादर मेरे कंधे पर थी
मेरी नौकरी फिर से चल पड़ी थी !
प्रतिभा प्रसाद |
इज्ज़त पे लगने लगा प्रश्नों का ढेर
था यह रोज़ का सिलसिला
अनाम अनजान प्रेमी
न जाने कहाँ से आ
था बीच में खड़ा
इससे निकलने की न थी कोई राह
नौकरी छोड़ भी दूँ तो
घर चलाने की थी समस्या
परिवार बड़ा था
खर्चा मुंह बाये खड़ा था
प्रश्नों की बौछार से मैं लहूलुहान थी
मरने को तैयार थी |
तभी माँ ने समझाई एक तरक़ीब
कुछ महीनों की छुट्टी ले घर बैठ गई
प्रश्नों के ढेर से निकल गई
समय से पति को दफ्तर भेज
घर में आराम से काम निपटाती
मस्ती में गुनगुनाने लगी थी
चेहरे की रौनक वापस आने लगी थी
तभी पति के साथ-साथ
सास की सांस अटकने लगी थी
ख़र्चे की तंगी खटकने लगी थी
अनाम अनजान प्रेमी की सांस टूटने लगी थी
ननद और देवर की जान सांसत में पड़ी थी
इनका बुरा हाल था
हाले बेहाल था
स्कूटर घर में पड़ा था
बस का सफ़र जारी था
इनके देर से घर आने पर
मैंने इज्ज़त पर उछाले प्रश्न
ये मौन नज़रें झुकाए खड़े थे
अपनी माँ-बहनों की नादानी पर
पश्चाताप के आंसू रोए थे
अनजान अनाम प्रेमी
कपूर बन उड़ चुका था
इज्ज़त की चादर मेरे कंधे पर थी
मेरी नौकरी फिर से चल पड़ी थी !
प्रतिभा प्रसाद |
क्या तुमने कल देखा है ?
काम के पुकार में जब चल पड़ा है तू
आग पेट की कब बुझेगी
सोच में डूबा है तू
प्रचंड गर्मी है तू तपा है
साँय-साँय लू चल रही
टपटप पसीना चू रहा
क्लांत शरीर प्यासा गला
आग पेट की जल रही
नसीहतों का पुलिंदा
मजदूरी में मिला
कल फिर आना 'चेंज' नहीं है
मन को चेंज कर गया
नहीं बुझी तब आग पेट की
अंजुली भर नल के पानी से
गिर पड़ा वह उसी जगह पर
मजदूरी की आस में
बंद मुट्ठी अब खुल चुकी थी
निर्निमेष आँखें घूर-घूरकर पूछ रही थीं ,
क्या तुमने कल देखा है ?
प्रतिभा प्रसाद |
आग पेट की कब बुझेगी
सोच में डूबा है तू
प्रचंड गर्मी है तू तपा है
साँय-साँय लू चल रही
टपटप पसीना चू रहा
क्लांत शरीर प्यासा गला
आग पेट की जल रही
नसीहतों का पुलिंदा
मजदूरी में मिला
कल फिर आना 'चेंज' नहीं है
मन को चेंज कर गया
नहीं बुझी तब आग पेट की
अंजुली भर नल के पानी से
गिर पड़ा वह उसी जगह पर
मजदूरी की आस में
बंद मुट्ठी अब खुल चुकी थी
निर्निमेष आँखें घूर-घूरकर पूछ रही थीं ,
क्या तुमने कल देखा है ?
प्रतिभा प्रसाद |
हरियाली
मौन बन
क्यूँ निरंतर घूमते हो
सच को चुपचुप में चुनते हो
जग में कैसी रीत निराली
दुनिया है
नीति-मूल्यों से बिलकुल खाली
देना है
जग में कुछ कर्तव्य परायणता का ज्ञान
जग हो चला इससे
कुछ बिलकुल अनजान
परिश्रम के मोती
जब बिखरेंगे धरती पर
लहलहाएगी हरियाली
इस धरती ,
इस पृथ्वी पर!!
प्रतिभा प्रसाद |
क्यूँ निरंतर घूमते हो
सच को चुपचुप में चुनते हो
जग में कैसी रीत निराली
दुनिया है
नीति-मूल्यों से बिलकुल खाली
देना है
जग में कुछ कर्तव्य परायणता का ज्ञान
जग हो चला इससे
कुछ बिलकुल अनजान
परिश्रम के मोती
जब बिखरेंगे धरती पर
लहलहाएगी हरियाली
इस धरती ,
इस पृथ्वी पर!!
प्रतिभा प्रसाद |
Subscribe to:
Posts (Atom)
