अमन-चैन

यशोदा सुलाने चली कृष्ण-कन्हैया को 
हे बालगोपाल कृष्ण सो जा ,
वरना लादेन आएगा 
तुमको उठाएगा 
आतंकवादी बनाएगा 
नहीं बना तो
तुम्हें गोली से उड़ाएगा
कृष्ण ने हँसकर कहा ,
अच्छा! उसकी ऐसी मजाल !
उसकी मशीनगन क्या मेरे सुदर्शन चक्र से टकराएगा ?
पूतना का वध क्या वह भूल गया ?
आ जाने दे , दो चार हाथ कर लेने दे 
कालिया की तरह उसके भी सिर पर नाचूँगा 
उसे आतंकवादी से इन्सान बना डालूँगा 
फिर मशीनगन की जगह 
उसके हाथ में होगा मोर का पंख 
जिसे झलकार वह मुझे सुलाया करेगा 
धमकी की जगह लोरियाँ गाया करेगा 
फिर पूरा विश्व अमन-चैन से सोया करेगा !!
                                                                   प्रतिभा प्रसाद

 

मनुष्यता

बीती रात की बात थी 
मैं अनजान थी 
सपनों से निकलकर 
धरातल पर आई थी 
सूनी सी बगिया , बेजान सा घर 
किसी किलकारी के भ्रम में 
सिसकती इन्तजार के क्रम में 
कोई मेरे पास न आता 
दूर-दूर से झाँक-झाँककर
पौधे को बस देखा करता 
लगाए हैं मैंने मनुष्यता के पौधे 
बस उसकी कोंपले निकल आई हैं 
इसी को पाने को मेरे यहाँ 
लगी है लम्बी कतार
अभी फूल - फल आने बाकी हैं 
इसी माँग पर मैं हूँ अचंभित 
मंडराता है एक प्रश्न आस-पास 
पौधे को समूल नष्ट करने की 
कोई साजिश तो नहीं !!
                                            प्रतिभा प्रसाद |

पड़ोसन का चेहरा

होली से एक दिन पहले 
इनकी खो गई एक अंगूठी 
बहुत ढूंढा पर मिली नहीं 
होली इनकी फीकी -फीकी रही 
इतने में आई एक पड़ोसन 
हाथों में अंगूठी और चेहरे पर शरारत 
चाहती थी शाबाशी और ईनाम
इन्होंने झट हाथ बढ़ाया
और अँगूठी को अपनी अँगुली में पहुँचाया 
पड़ोसन शुक्रिया या मिठाई पाने की 
मुद्रा में खड़ी मुस्कुराती रही 
ये मुस्कुराये और अँगुली को नचाया 
कहा , कल आपने हाथ मिलाया था 
कब निकल लिया पता ही नहीं चला ....
और पड़ोसन का चेहरा 
बिना गुलाल के ही गुलाबी हो गया |
                                                           प्रतिभा प्रसाद |


मैं पास तुम दूर सखी

कैसे होगा मिलन हमारा 
तुम सुबह मैं शाम सखी 
कैसे होगा मिलन हमारा
तुम दिन मैं रात सखी 
कैसे होगा मिलन हमारा
तुम जीत मैं हार सखी 
कैसे होगा मिलन हमारा
तुम धूप मैं छाँव सखी 
कैसे होगा मिलन हमारा
तुम खास मैं आम सखी 
नशा    तुम्हारे ऊपर अब भी 
जाम तुम्हारा खनक रहा 
जामों को टकराकर तुम तो
मदहोश हुई सी जाती हो 
मैं तो तुम से दूर खड़ी हूँ 
देख तुम्हें मदमस्त हुई 
साहस पाकर जाम उठाने 
हाथ बढ़ा यूँ पहुँच गई 
जाम अभी भी दूर पड़ा है 
तुम भी मुझसे दूर खड़ी 
मंद पवन के चंद झकोरे 
तुम तो हो मदमस्त परी 
कैसे होगा मिलन हमारा
मैं पास तुम दूर खड़ी 
मैं तो हूँ एक आम सखी ही 
तुम तो हो एक ख़ास सखी 
कैसे होगा मिलन हमारा
मैं पास तुम दुए खड़ी !!
                                       प्रतिभा प्रसाद |   

नियति

मेरी  गलतियों  पे ,
तेरा व्यंग्य  से  मुस्कुराना 
बात-बात पे छलना,
क्या यही तेरी नियति है ?
आज तुम हो अन्दर ,
मैं दरवाजे पे खड़ी हूँ 
साँस मेरी अंदर ,
तुम पहरे पर खड़े हो 
एक हाथ हो तेरा 
एक हाथ हो मेरा 
सुख -दुख में मिल-जुलकर 
चलाएँ घर-संसार 
ये भावना हमारी 
हमेशा मुझे है छलती
तेरी नियति से टकराकर 
टूट-टूट बिखरती
तेरे हाथों का न मिलना 
यही नियति थी हमारी 
आँखों -आँखों में ही जीना 
भटकन थी हमारी 
तेरा रोज़ का ये छलना 
सहती रही हूँ कब से 
सदियाँ बीत गई हैं 
नियति न तेरी बदली 
आँसू भरे नयन से 
मैं भीख माँगती हूँ 
छलना न कभी किसी को 
ये प्रार्थना हमारी 
कहीं खुद न छले जाओ 
विडम्बना यही तुम्हारी 
दुख तभी भी होगा मुझको 
आँसू  बन छलेगा
तुम रोक न पाओगे 
उन मोतियों की लड़ी को 
हाथ तेरा सुना 
जीवन अधूरा होगा 
नियति के खेल को तुम ,
कहाँ तक छ्लोगे?
जो दिया था कभी तुमने ,
वही तो मिलेगा 
फिर रुदन तुम्हारा क्यूँ है ?
यह सोच लो जरा तुम 
गलतियों पर व्यंग्य से मुस्कुराना 
नियति नहीं तुम्हारी 
प्यार से थपथपाना 
अधिकार भर जताना
हाथों में हाथ लेकर ,
साथ -साथ चलना 
जीवन यही हमारा 
नियति की देन है |
                              प्रतिभा प्रसाद |



भ्रूण

मैं जब- जब अन्दर होती हूँ 
तू हँसती है , गुनगुनाती है 
खिल -खिल सी जाती है 
मुझको थपकाती है , लोरी सुनाती है 
फिर पापा के कहने से 
तू एक 'टेस्ट' कराती है 
जैसे ही तुझे पता चलता है 
कि मैं एक कन्या भ्रूण हूँ 
तू छटपटाती है 
रुआँसी हो जाती है 
मुझसे छुटकारा पाती है 
ऐ माँ तू मुझको धरती पर ला 
तेरा हाथ बँटाॐगी
दानवता से तपती धरती को 
मानवता से नहलाऊँगी
तेरी ही तरह इस धरती को
औलादों से पाटूँगी
संतुलन समाज का बना रहे 
ऐसा कुछ कर जाऊँगी !!
                                       प्रतिभा प्रसाद

यहीं तो सब छोड़ जाएगा

वह प्यार से एक बार बोल जाता 
तो उसका क्या चला जाता !
सूख़ गई मेरी आत्मा
मर गई प्रेम की अमर बेल 
मधुमास आता है
बरस - बरस जाता है
मुझको रुलाता है
प्रेम का अहसास भर करा जाता है
ख़ाली आचल को भरने की जगह
लहराकर लौट जाता है 
अहसास करा जाता है 
तुम हो रिक्त 
कभी न हो सकोगे सिक्त
प्रेम इश्वरीय देन है 
तुम्हारा रुदन येन-केन-प्रकारेण है 
मधुमास को चले जाने दो
आँचल को लहराने दो
कमर कसो
कर्म में जुट जाओ 
यही तुम्हारी नियति है 
प्रेम बाँटना भर शेष है 
प्रेम लेने को क्यूँ विकल है 
देने में जो संतुष्टि है 
वही तो मन की पुष्टि है 
देना भर तेरा काम है 
प्रेम भरा संसार है 
लेकर तू क्या जाएगा ?
यहीं तो सब छोड़ जाएगा !!
                                          प्रतिभा प्रसाद |

सरस्वती का बरदान

हे सरस्वती !
ज्ञान तू देना
विद्यादान तू देना 
भर दे मेरी कलम में ऐसी कुछ ताकत 
मिटा दूँ इस दुनिया से भ्रस्टाचार , घूसखोरी 
अत्याचार - अनाचार की इस धरती पर
युद्ध से त्रस्त मानव को
शांति अमन चैन की राह दिखा सकूँ
मानव को मानव से लड़ने से बचा सकूँ
आज तो जंगल और पशु भी 
भयभीत हैं मानव से
उन्हें भी चाहिए त्राण
मानव को प्राण
युद्ध की विभीषिका से 
वेदना में असमर्थ
जंगल वन पशु  पक्षी 
और पर्वत भी चिंतित हैं 
मेरी कमल की ओर उनकी भी निगाह है
मुरझाए हुए पौधे
विलुप्त होते पशुधन
चुपचाप नयनों की भाषा में कह जाते हैं
कुछ मेरे लिए भी सोचो
मैं भी तुम्हारी सोचता हूँ 
तुम्हारा ही कल्याण करता हूँ 
आज विवश हो तुम्हारी ओर निहार रहा हूँ
कुछ आशा के क्षण मेरे भी हैं
यह तुम भी समझो
परमाणु के विस्फोट से
मैं भी काँप जाता हूँ 
काँप उठती है मेरी रूह 
विध्वंस के बाद कैसी होगी शांति ?
क्या तुम जानते हो ?
यह है एक प्रश्न अनुतरित 
यदि हो तुम्हारे पास इसका जवाब 
हे सरस्वती माता ! मुझे बता देना 
देना मेरी कलम में इतनी ताकत 
दुनिया- ब्रह्माण्ड को बता सकूँ 
ऐसी है अभिलाषा !
क्या तुम इसे पूरा करोगी ?
मुझे ज्ञान का दान चाहिए 
अपनी कलम में ऐसी ताकत चाहिए 
तुम्हारा प्रभुत्व इस दुनिया को दिखा सकूँ 
ऐसा ज्ञान चाहिए 
हे माता ! ऐसा ज्ञान चाहिए | 
                                             प्रतिभा प्रसाद |

"अनुराग"

तुम जो गयी साथ उनके
प्राण मेरे ले गयी
जीत कर वे तुम्हे
खुद जितेश हो गए
आसू थे जो पलक में
दुलक कर मोती बने
इन मोतियों के पार जाकर
चुने है जो सीप तुमने
बाहुपास है सुहाग का
प्रेम का अनुराग है
प्रेम का अनुबंध तेरा
अचल अविचल रहे

                                   प्रतिभा प्रसाद |

"इस्तीफा"

गुनाह तुमने किया ,
गुनाहगार मुझको किया ,
इस्तीफा मुझ से लिया ,
बदनाम मुझ को किया ,
जिसके सम्मान को ,
मुझ से इस्तीफा है लिया ,
दुष्प्रचार उसके विपरीत किया ,
गुनाह तुमने किया ,
गुनाहगार मुझको किया ,


मेरी रोजी गई ,
मेरी रोटी गई ,
मेरा मान गया ,
सम्मान गया ,
अपमान गरल को मैंने पिया ,
अठ्हास मुझ पर तुने किया ,
गुनाह तुमने किया ,
गुनाहगार मुझको किया ,


अपयश की कोठरी मुझ को मिली ,
यश का गुलदस्ता तुमने लिया ,
तुमने पल पल ही मुझे को बदनाम किया ,
मेरी प्रतिभा को तुमने खंडित किया ,
गुनाह तुमने किया ,
गुनाहगार मुझको किया ,


मेरे भोलेपन को कुचला दिया ,
मेरे विशवास का तुमने मर्दन किया ,
जाना था सलाहकार तुमको सदा ,
तुमने ही मुझे को दगा है दिया ,
मेरा इस्तीफा था साजिशो का एक मोहरा ,
यदि इसका भान हुआ होता ,
प्रतिक्रिया हमारी आती जरुर ,
गुनाह तुमने किया ,
गुनाहगार मुझको किया ,


साजिशे अब मुझ को डराती नहीं ,
सीपों सी उसको चुनती रही ,
आँचल में उसको बुनती रही ,
अब ये खिलौना है मेरे लिए
इसी ने मुझको है पत्थर किया
झंझावातों से लड़ना सिखाया मुझे
गुनाह तुमने किया ,
गुनाहगार मुझको किया ,


                                               प्रतिभा प्रसाद |